तत्त्वज्ञान

बीजेपी का दर्शन: हिन्दुत्व (सांस्कृतिक राष्ट्रवाद)

हिन्दुत्व अथवा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बीजेपी के भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारण प्रस्तुत करता है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि हिन्दुत्व एक राष्ट्रवादी अवधारणा है, न कि धार्मिक अथवा ईश्वरीयतंत्रवादी अवधारणा। श्री अरूण शौरी द्वारा एक आलेख, जिसे उच्चतम न्यायालय द्वारा हिन्दुत्व निर्णय के रूप में जाना गया है, में विशद विवरण प्रस्तुत किया गया है।

श्री अरूण शौरी द्वारा एक साप्ताहिक कालम
24 अप्रैल, 1996

यह स्वीकार करना कि चुनाव भाषणों में धर्म के सभी संदर्भ भ्रष्ट चुनाव पद्धतियों की श्रेणी में नहीं रखे जा सकते हैं; कि उम्मीदवार अथवा उसके विरोधी के धर्म के आधार पर वोट मांगना भ्रष्ट चुनाव पद्धति है; कि अन्य लोगों द्वारा दिए गए बयानों का उतना असर नहीं होता है जितना कि स्वयं उम्मीदवार के बयान का होता है - इस सब में, जैसाकि हमने देखा है, सर्वोच्च न्यायालय ने मात्र वही दोहराया है जो स्वयं कानून कहता है और जो सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व अवसरों पर स्वीकार किया है। तब फिर धर्मनिरपेक्षतावादियों के क्रोध का कारण क्या है?

पहली चीज जो उन्हें नागवार गुजरी यह थी कि न्यायालय ने सभी उम्मीदवारों को एक बराबर माना है! धर्मनिरपेक्षतावादियों के तर्क के आधार पर, जब कोई मुस्लिम उम्मीदवार कहता है, या कि सामाजिक-परिवर्तन की ताकतों के मध्य से कोई उम्मीदवार कहता है, इस्लाम खतरे में है, एकजुट हो जाओ, तब कुछ गलत नहीं होता है चूंकि अल्पसंख्यकों के लिए असुरक्षित महसूस करना स्वाभाविक होता है; परंतु जब कोई हिन्दू उम्मीदवार कहता है, एकजुट हो जाओ, हिन्दुत्व खतरे में है, तब कैसी अजीब बात है कि वह साम्प्रदायिक हो जाता है, वह भ्रष्ट निर्वाचन पद्धतियों में लिप्त कहा जाता है, उसका चुनाव रद्द किए जाने की मांग की जाती है। जब कोई मुस्लिम उम्मीदवार कहता है, एकजुट हो जाओ और किसी बात को मंजूर करवाने के लिए इस सरकार को झुका दो, तब धर्मनिरपेक्षतावादियों की नजर में वह सुधार की बात कर रहा होता है; पर जब कोई हिन्दू उम्मीदवार कहता है, एकजुट हो जाओ ताकि यह सरकार इन सम्प्रदायवादियों के आगे नहीं झुके तो वह साम्प्रदायिक और धार्मिक कट्टरता का पोषक कहा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों को एक समान माना: जैसेकि प्रधानमंत्री कहे कि केवल गैर-हिन्दुओं के लिए रू. 500 करोड़ का बैंक स्थापित किया जा रहा है - यदि ऐसा कहना भ्रष्ट चुनाव पद्धति नहीं है तब इसका विरोध करना भी भ्रष्ट चुनाव पद्धति नहीं है; जैसे यह कहना कि इस्लाम (अथवा उर्दू या तमिल) खतरे में है, भ्रष्ट चुनाव पद्धति नहीं है तब हिन्दुत्व (अथवा संस्कृत) खतरे में होने की बात कहना भी भ्रष्ट चुनाव पद्धति नहीं है। यह पर्याप्त स्पष्ट प्रतीत होता है। पर इतनी स्पष्ट बात धर्मनिरपेक्षतावादी हजम नहीं कर पा रहे हैं। उनके जुबानी हमले का मूल तत्व रहा है कि गैर-हिन्दुओं में और खासकर मुसलमानों के पक्ष में असंतुलन है।

उनकी नजरों में निर्णय का दूसरा दोष इस तथ्य से पैदा हुआ जो न्यायालय ने स्वीकार किया, वस्तुतः हिन्दू की, हिन्दुत्व की परिभाषा को अंगीकार किया जो आरएसएस तथा बीजेपी द्वारा कहा जाता रहा है कि उन्होंने जब कभी इन अभिव्यक्तियों का प्रयोग किया है उसका तात्पर्य क्या है। धर्मनिरपेक्षतावादियों के इस तरह आक्रामक होने के दो भिन्न कारण हैं। पहला कारण कि न्यायालय ने आरएसएस तथा बीजेपी की शाब्दिक प्रस्तुति को अनुमोदन हेतु उपयुक्त माना, जो अपने आप में अभिशाप था। पर यह तथ्य यदि अधिक नहीं तो प्रतिकूल अवश्य था कि ऐसा करने में न्यायालय ने वह वर्णन अंगीकार किया था जो हिन्दूवाद: हिन्दुत्व, हिन्दू का पूरक है, ये शब्द सहिष्णुता, सार्वभौमवाद के संकेतक हैं, न्यायालय ने स्वीकार किया। हैदराबाद में माक्र्सवादी बुद्धिजीवियों को शिकायत थी कि न्यायालय ने इन शब्दों को गुणों का सारसंक्षेप मानना उपयुक्त समझा है। यह वास्तव में अक्षम्य है। धर्मनिरपेक्षतावादी के लिए हिन्दू, हिन्दुत्व इत्यादि का तात्पर्य कूड़ादान है, यह सब सारसंक्षेप शर्मनाक है और इससे भी बढ़कर पाप है। इसमें धर्मनिरपेक्षतावादी स्वयं को दो धाराओं में संयुक्त करते हैं - मैकाल-मिशनरी धारा और मार्कसवादी धारा। और यहां न्यायालय इसके विपरीत अभिपुष्ट कर रहा था। जिस न्यायालय में धर्मनिरपेक्षतावादियों ने आरएसएस-बीजेपी पर आरोप लगाए थे उसी के निर्णयों को समझ नहीं रहे थे। स्वाभाविक है कि बेचारे क्रोध में जल रहे थे।

और सूक्ष्मतः इसीलिए आरएसएस तथा बीजेपी ने समर्थन की घोषणा की थी। वास्तव में वे सही थे कि इन शब्दों का उनके द्वारा की गई व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकार की गई थी। पर मैं इससे लगभग अर्द्धसंतुष्टि ही अनुभव कर रहा हूं। न्यायालय ने स्वीकार किया है कि हिन्दू, हिन्दुत्व इत्यादि शब्द का तात्पर्य सिंधु के आसपास तथा आगे के भूभाग की संस्कृति से है। न्यायालय ने घोषणा की कि इन शब्दों का अर्थ पारंपरिक भाव से धर्म नहीं समझा जाना चाहिए। ये शब्द सांस्कृतिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक हैं - एक शब्द में आपके और मेरे, हमारे अधिकांश देशवासियों द्वारा पालन किए जाने वाले धर्म के संकेतक शब्दों को छोड़कर सबकुछ है। न्यायालय की दृष्टि में हम जिस पद्धति का पालन करते है तथा आस्था रखते हैं धर्म कदापि नहीं है। यह इतना विविध है। इसकी एक पुस्तक नहीं है। इसका कोई देवदूत नहीं है, न कोई चर्च जैसाकि धर्म का होता है। इसलिए यह कोई धर्म नहीं है।

सर्वप्रथम बिन्दु वास्तव में यह कि यह आगे बढ़ने का एक वृत्तीय मार्ग है। पहले धर्म की परिभाषा एक ऐसी चीज के रूप में की गई है जिसकी एक पुस्तक, एक देवदूत, एक चर्च इत्यादि होता है, और फिर, हिन्दुत्व में ये सब नहीं है, इसको धर्म कदापि घोषित नहीं किया जा सकता है। परंतु धर्म को इस प्रतिबंधात्मक ढंग से परिभाषित क्यों किया जाना चाहिए? आस्थाओं तथा पद्धतियों की कोई व्यवस्था जिसकी कोई एक पुस्तक, एक देवदूत, एक चर्च नहीं है, एक व्यवस्था जिसकी बहुलता की अपनी केन्द्रीय विशेषता है, एक व्यवस्था जिसमें अंतिम निर्देश कोई एक पुस्तक अथवा चर्च जैसा मध्यस्थ नहीं अपितु अपना आन्तर, प्रत्यक्ष अनुभूति को भी धर्म का एक प्रकार नहीं माना जाना चाहिए?

अन्य बिन्दु यह है कि हिन्दू इत्यादि की परिभाषा करने का यह ढंग किसी अविद्यमान चीज की परिभाषा करना है। न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व पीठ के निर्णय का संदर्भ प्रस्तुत करता है। सन 1976 में सम्पदा कर आयुक्त, मद्रास बनाम स्व. आर. श्रीधरन मामले में न्यायालय ने “हिन्दू” शब्द की सूक्ष्मता के साथ परिभाषा करना कठिन है की स्थिति से प्रारंभ करते हुए घोषणा की थी कि हिन्दू बिना गैर-हिन्दू हुए, किसी गैर-हिन्दू धर्म को अपना सकता है। हो सकता है कि उस घोषणा से किसी कर-दाता अथवा सम्पदा के दावेदार को काई सहायता मिली हो, या हो सकता है कि किसी वाद में चुनाव याचिकादाताओं को बचाव का कोई स्वीकार्य रास्ता मिल गया हो। परंतु मुझे इस प्रकार का सूत्रण गहन दोषपूर्ण प्रतीत होता है। मुझे वह वक्त याद आ रहा है जब मिशनरीज और भारत में उनके मित्रगण कहा करते थे - अरे तुम लोग जो करते हो वह धर्म कदापि नहीं है; आओ हम तुम्हें वास्तविक धर्म देंगे। उपरोक्त सूत्रण हमारी स्थिति का प्रमाण भी है कि चुनावी भाषणों में हिन्दुत्व के संदर्भों का बचाव अविद्यमान हिन्दुत्व की परिभाषा द्वारा ही किया जा सकता है।

आरएसएस, बीजेपी इत्यादि के पास खुश होने का कारण सचमुच मौजूद है कि हिन्दू, हिन्दुत्व इत्यादि की उनकी परिभाषा स्वीकार कर ली गई है। परंतु हमारे धर्म और परम्पराओं की उनके द्वारा भी की गई परिभाषा स्वयं एक प्रतिक्रिया है। यह उन आरोपों की प्रतिक्रिया है कि यह धर्म संकीर्ण मानसिकता, कट्टरता, असमानता इत्यादि का धर्म है, यह उन आरोपों की प्रतिक्रिया है जो 19वीं सदी में मिशनरियों और उनके मित्रों द्वारा लगाए गए थे और जो धर्मनिरपेक्षतावादियों द्वारा पिछले कुछ दशकों में पूरा जोर लगाकर दोहराए जाते रहे हैं। वह सूत्रण न्यायालयों द्वारा हमारे चुनाव कानूनों की जा रही व्याख्या के ढंग की भी प्रतिक्रिया थी। इस प्रकार की व्याख्या समय के मिजाज का परिणाम था, एक मिजाज जिसमें हिन्दुत्व के बारे में हर मिथ्यापवाद के आन्तरीकरण में उपयुक्तता देखी जाती थी। यह अल्प संतोष की बात हो सकती है कि बचाव प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया सूत्र अब आस्था की आधिकारिक परिभाषा है - उस आस्था की परिभाषा जो उस परिभाषा के द्वारा आस्था कदापि नहीं है।

मैं निश्चय ही प्रगति को कम करके नहीं आंकना चाहता हूं। जबकि देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंततः चुनावी भाषणों में हिन्दुत्व के संदर्भों को अन्य धर्मों के समकक्ष रखा जाना एक बड़ी प्रगति है। यह परिवर्तन की बयार की सीमा का भी द्योतक है। जैसाकि मैंने उल्लेख किया है, ये दो निर्णय सम्पूर्ण श्रृंखला में क्रमानुसार सातवां तथा आठवां निर्णय हैं। ये सभी निर्णय अलग अलग और सामूहिक रूप से छद्म धर्मनिरपेक्षतावाद की समालोचना को न्यायसंगत करार देते हैं, जो आरएसएस तथा अन्यों द्वारा आगे बढ़ाई जा रही है। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए तथ्यों के अतिरिक्त, प्रस्तुत किए गए अकाट्य तर्कों के अतिरिक्त, यह माना जाता है कि यदि हिन्दुओं को धकेला जाना जारी रहेगा, तब निश्चय ही वे प्रतिक्रिया देंगे, जिसने समूचा अन्तर पैदा किया है। इनमें अयोध्या निर्णयों के पश्चात का गहन भाव बोध है।

परंतु हिन्दुत्व निर्णय यह भी दर्शाते हैं कि अभी काफी दूरी तय की जानी बाकी है। स्वयं न्यायालय हिन्दू, हिन्दुत्व इत्यादि की स्वानुमोदित परिभाषा से पूर्ण रूप से संतुष्ट प्रतीत नहीं होता है। याद करें इसने मनोहर जोशी वाद में अपने निर्णय में क्या कहा था। मनोहर जोशी के विरोधी ने जोशी का निर्वाचन रद्द करने संबंधी अपने अनुरोध में निवेदन किया था कि जोशी ने वोट मांगने के लिए धर्म का उपयोग किया था। उन्होंने इस संबंध में जोशी के बयान का हवाला दिया कि महाराष्ट्र देश में पहला हिन्दू राज्य होगा। न्यायालय ने निवेदन रद्द कर दिया और कहा, हमारी राय में महज एक बयान कि पहला हिन्दू राज्य महाराष्ट्र में स्थापित होगा, अपने आप में उम्मीदवार के धर्म के आधार पर वोट की अपील नहीं है, परंतु यह अभिव्यक्ति अधिक से अधिक ऐसी आशा मानी जा सकती है - वह निष्कर्ष, जैसाकि मैंने कहा था, बदली परिस्थिति का सूचक है, इस प्रकार की आशा व्यक्त करने वाले व्यक्ति को संदेह का लाभ दिया जा रहा था; यह दर्शाता है कि मामला कितना नाजुक है - न्यायाधीशों की कोई अन्य पीठ इसी बयान को उम्मीदवार द्वारा हिन्दू राष्ट्र की स्थापना में सहायता के लिए धर्म के आधार पर वोट की अपील करार दे सकती थी इत्यादि। पर न्यायालय ने जेा कहा वह दर्शाता है कि अभी कितनी दूरी तय की जानी है।

न्यायालय ने कहा ऐसा बयान कितना भी तिरस्कार के योग्य हो, यह उसके धर्म के आधार पर वोट के लिए अपील नहीं माना जा सकता है। यह कल्पना करते हुए कि उस सभा में अपीलकर्ता के भाषण में ऐसा बयान दिया जाना सिद्ध हो जाता है, हम यह स्वीकार नहीं कर सकते कि यह धारा 123 की उप-धारा (3) अथवा उप-धारा (3क) के अधीन भ्रष्ट कार्य है, भले ही हम देश में किसी भी भाग में किसी राजनीतिक नेता के ऐसे विचार अथवा उदाहरण के प्रति तिरस्कार अभिव्यक्त करेंगे।

हिन्दू शब्द को संकीर्ण मानसिकता वाले धर्म के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि हिन्दुत्व, हिन्दूवाद सांस्कृतिक, भूभागीय, ऐतिहासिक अवधारणाएं हैं जो व्यापक मानसिकता, सहिष्णुता, उदारता से परिपूर्ण समावेशी परम्परा है, क्योंकि हिन्दूवाद मात्र गुणों का सार है, तब यह कहने पर तिरस्करणीय कैसे हो गया कि महाराष्ट्र पहला हिन्दू राज्य होगा, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तिरस्कार की अभिव्यक्ति किस तर्क के आधार पर की गई ?

यह कोई नगण्य असंगति मात्र नहीं है। क्योंकि दूसरे पक्ष में कहा जाता है कि हिन्दू, हिन्दुत्व इत्यादि गुणविशेषताओं का सारसंग्रह है। हमारे भाषणों में, स्वयं सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों में भी केवल हिन्दुओं को इन उत्कृष्ट प्रतिमानों का पालन करने को कहा गया है। सहिष्णु, व्यापक मानसिकता के बारे में प्रवचन केवल उनको दिए जाते हैं - इसके प्रत्यक्ष उदाहरण के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं, ये अयोध्या के विषय में राष्ट्रपति-संदर्भ के प्रत्युत्तर में सर्वोच्च न्यायालय की उद्धोषणाओं में देखा जा सकता है। चीजों को इस तरह से देखना आगजनी करने वालों को उस संरचना के बराबर ला खड़ा करता है जिसे वह फूंकने पर आमादा है।

हिन्दुत्व को परंपरागत रूप से इस देश की अधिकांश जनसंख्या की मान्यता तथा पद्धतियों का समुच्चय, उनके जीने का ढंग है, जो संकट में है। यह धर्मनिरपेक्षतावादियों की घृणा और साजिशों के निशाने पर रहा है। जिस तरह से राज्य को मुसलमान मतदाताओं के नियंत्रकों के सामने झुकने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जिस तरह आतंकवादियों इत्यादि के सामने निरीह छोड़ा जा रहा है, उसके कारण संकट में है। जम्मू में शरणार्थियों की दशा इस संकट और इसके परिणामों का ज्वलंत उदाहरण है। धर्मनिरपेक्षता को उस जीवन चर्या पर हमले का साधन बना दिया गया है, जिसकी प्रशंसा न्यायालय द्वारा इतने स्पष्ट रूप से की जाती है। नवरत्न राजाराम ने अपनी लघु उत्कृष्ट पुस्तक सेक्यूलरिज्म (वॉइस ऑफ इंडिया, 1995) ने दर्शाया है कि इस अवधारणा को किस प्रकार समझा गया है और इसके हमारे तथा हमारे समाज के लिए क्या परिणाम हो सकते हैं।

यूरोप में चर्च ने जीवन के सभी पहलुओं के लिए कानून बनाने का अधिकार स्वीकार और सुरक्षित किया है। यूरोप में बुद्धिजीवियों तथा कुछ शासकों ने इस दमघोंटू जकड़ से स्वयं को मुक्त कराने के लिए धर्मनिरपेक्षतावाद की अवधारणा का निर्माण किया। उन्होंने तर्क प्रस्तुत किया कि चर्च बता सकता है कि “ईश्वर” क्या है, पर इसको सीजर क्या था इस बारे में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। जैसाकि राजाराम ने दर्शाया है, यह अवधारणा चर्च के सम्पूर्णतावादी और अनन्यतावादी दावों के सामने व्यक्ति के लिए स्वायत्ता का दायरा सृजित करने हेतु युक्ति की अवधारणा थी। परंतु भारत में पिछले पचास वर्षों में यह शब्द सम्पूर्णतावादी और अनन्यतावादी विचारधाराओं की रक्षा के लिए एक छत्र बन चुका है, बल्कि यथार्थतः यह एक हथियार बन चुका है जिसके द्वारा ऐसी विचारधाराओं के सुसमाचार-लेखक हमारे देश की बहुलक परम्परा, हिन्दुत्व के मूल विश्व-दर्शन में स्थापित परम्परा पर प्रहार करते रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के ये नए निर्णय मान्यता प्रदान करते हैं कि हिन्दुत्व अतिप्राचीन काल से बहुलता और सहिष्णुता और करूणा के इन सिद्धांतों को अपने अंतर में समेटे हुए है। परंतु वे इन सिद्धांतों को केवल हिन्दुओं पर थोपने की आदत को विपर्यक्रम नहीं देते हैं।

इस प्रकार ये निर्णय एक तरफ आक्रमणकारियों को उस परम्परा को धकियाने के लिए स्वतंत्र छोड़ देते हैं और दूसरी तरफ हिन्दुओं में पहले की अपेक्षा और अधिक तीखी प्रतिक्रिया की संभावना खुली छोड़ देते हैं। परंतु शायद न्यायालय से सब कुछ अचानक बदल देने की आशा नहीं करनी चाहिए। परिवर्तन की बयार ने हमें यहां तक पहुंचा दिया है - कि धर्मनिरपेक्षतावादियों द्वारा इसके ऊपर थोपे गए मिथ्या आरोपों के स्थान पर, न्यायालय हिन्दुत्व को उच्च आदर्शों के साथ सम्बद्ध कर रहा है। माहौल में भावी परिवर्तन हमें मंजिल की ओर ले जाएगा।

प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी चुनावों के दौरान जो कर रहे हैं उसमें हमारी मंजिल तक की दूरी और निर्णयों के आलोक में, महज कानून द्वारा दुरूपयोग नियंत्रित करने हेतु, इसकी कठिनाइयों दोनों दिखाई पड़ते हैं। न्यायालय ने कहा - और ऐसा आवश्यक भी था - कि किसी उम्मीदवार के चुनाव को चुनौती देने के लिए आधार बनाए जाने वाल भाषणों, दस्तावेजों, वीडियोज इत्यादि उम्मीदवार द्वारा चुनाव अभियान के दौरान अर्थात् चुनाव अधिसूचना की तिथि से मतदान समाप्त होने तक कही गई बातों को रिकॉर्ड या वर्णन करने के लिए दिखाए जाने चाहिए। बेशक, ऐसा होना भी चाहिए। परंतु इसमें भी कोई संदेह नहीं कि यह व्यक्ति अथवा उसकी पार्टी को चुनाव अधिसूचना जारी किए जाने की तिथि तक जाति, धर्म, भाषा इत्यादि के आधार पर अपीलों का प्रयोग करने और उसके बाद वोट देने के लिए वोटरों के मन में पहले ही निर्मित किए जा चुके साहचर्यों का आश्रय लेने हेतु खुला छोड़ देता है। जरा देखिए कि प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी पिछले कुछ महीनों में क्या करते रहे हैं। वे हर दरगाह पर सिर झुकाने जा रहे हैं, वे मस्जिदों के इमामों को वेतन का वादा करते फिर रहे हैं, सीताराम केसरी मुसलमानों को आरक्षण का वादा कर रहे हैं। प्रधानमंत्री उलेमाओं तथा अन्यों के साथ धार्मिक समूह के रूप में मुसलमानों के प्रतिनिधियों के साथ बैठकें कर रहे हैं और उन्हें धार्मिक सम्प्रदाय के प्रतिनिधियों के रूप में आश्वासन दे रहे हैं। इसमें तनिक भी संशय नहीं कि ये सभी कदम धर्म के जरिये मुसलमानों के वोट हासिल करने की कोशिशों के तौर पर उठाए जा रहे हैं।

पहला सवाल इन प्रयासों पर सार्वजनिक टिप्पणी की प्रकृति के बारे में है। आपकी याद में कितने धर्मनिरपेक्षतावादियों ने वोट हासिल करने के इस धर्म के खुल्लमखुल्ला उपयोग का त्याग किया है? दूसरा सवाल कानून के बारे में है। तकनीकी दृष्टि से चूंकि चुनावों की घोषणा नहीं हुई है, प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों को इस युक्ति के उपयोग की पूरी स्वतंत्रता है।

इसके अतिरिक्त, एक विषय पर यह प्रतीत होता है कि न्यायालय ने एक विकल्प का वरण किया है, जो हमें महंगा पड़ सकता है। मामला इस प्रकार हैं जैसाकि सुविदित है, अनुच्छेद 19(1)(क) हमें वाणी की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 19(2) में वे आधार विनिर्दिष्ट किए गए हैं, जिनके आधार पर, इस मूलभूत अधिकार पर न्यायसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। रामजेठमालानी ने तर्क प्रस्तुत किया कि उपरोक्त विनिर्दिष्ट आधारों में केवल एक आधार ऐसा है जिसके द्वारा चुनावों के दौरान धर्म इत्यादि के विषय में बोलने की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है, जोकि लोक व्यवस्था है। न्यायालयों ने अनेक अवसरों पर यह स्वीकार किया है कि मूलभूत अधिकारों को प्रतिबंधित करने के लिए लोक व्यवस्था भंग होने की आशंका मात्र पर्याप्त नहीं है, बल्कि शांति भंग का प्रत्यक्ष उदाहरण होना चाहिए। व्यवस्था भंग होने की निश्चित और तात्कालिक संभावना होनी चाहिए। जेठमालानी ने तर्क दिया कि एक निर्वाचन कानून में प्रावधान, जिसमें इससे आगे बढ़कर वाणी की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने की याचना की गई है, अपने आप में असंवैधानिक है।

न्यायालय ने यह तर्क स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि वस्तुतः वोट इत्यादि मांगने के लिए धर्म, जाति इत्यादि के उपयोग पर प्रतिबंधों का औचित्य अनुच्छेद 19(2) में वर्णित अन्य आधार नामतः शिष्टता और नैतिकता के आधार पर निर्धारित किया जा सकता है। न्यायालय ने निर्णय दिया कि शिष्टता तथा नैतिकता को यौन-नैतिकता मात्र तक सीमित करने का कोई कारण नहीं है। यदि अनुमति के साथ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सन 1972 में खुल्लर इत्यादि बनाम लोक अभियोजन निदेशक के एक अन्य मामले में दिए गए निर्णय को उद्धृत किया जाए, जिसमें न्यायालय ने कहा था कि अशिष्टता यौन अशिष्टता तक सीमित है; वास्तव में यह तय करना कठिन है कि किसी सामान्य शिष्ट पुरूष अथवा महिला की आघात लगना, अपमानजनक महसूस करना तथा घृणित महसूस करने की लक्ष्मण रेखा क्या है।

पक्या यह उपरोक्त आधार को परिभाषित करने का एक बार फिर अपनाया गया गोलमोल तरीका नहीं है। क्या ऐसा नहीं है कि वर्तमान हालात में, जबकि अश्लीलता पर लगाम लगाने के लिए, जहां इसकी सख्त जरूरत है - हमारी फिल्मों में भारीभरकम महिलाओं को अपनी देह मटकाने के लिए कहा जाता है, उपरोक्त प्रकार का दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता है और उन मामलों में प्रतिबंध के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है जहां पर कि वाणी का अबाधित होना आवश्यक है। हकीकत यह है कि वर्तमान तरीकों के अभ्यस्त लोगों को सभी सुधार प्रारंभ में झटका देते हैं और वर्तमान व्यवस्थाओं का फायदा उठाने वाले लोग विरोध करना आरंभ कर देते हैं। रामजेठमालानी के गुगलीनुमा तर्क के विषय में न्यायालय द्वारा की गई शिष्टता और नैतिकता की परिभाषा स्वयं एक वाइड बॉल की तरह है और कृतसंकल्प लोग इसे खिलौने की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं जिसका समर्थन स्वयं न्यायालय भी कदापि नहीं करेगा।

इसलिए इस मामले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। और जब कभी ऐसा अवसर उत्पन्न हो मैं दो अन्य सुझाव सानुरोध प्रस्तुत करना चाहूंगा। उप-धारा 3 और 3क, जो इन निर्णयों की विषय वस्तु रहीं हैं, में जाति को भी एक आधार बताया गया है जिसके आधार पर उम्मीदवार को वोट नहीं मांगने चाहिए तथा जिसके आधार पर नागरिकों के वर्गों के मध्य नफरत नहीं फैलानी चाहिए। मुझे पूरी उम्मीद है कि कभी न कभी शीघ्र ही न्यायालय के समक्ष इस आधार पर फैलाए जा रहे इस प्रकार के जहर की जांच का अवसर आएगा, भले ही यह सामाजिक न्याय के नाम में छद्म आवरण से ढका हो। दूसरा, यह कैसी बात है कि हमारे कानून के तहत धर्म, जाति, भाषा, नस्ल इत्यादि के आधार पर वोट मांगना या नफरत फैलाना अपराध है, पर वर्ग के आधार पर नफरत, विद्वेष फैलाना और वोट मांगना पूरी तरह सही है? क्या यह उपयुक्त समय नहीं है कि उस आधार को शामिल करने के लिए कानून में संशोधन किया जाए?